क्या इन्हें मानव कहा जा सकता है? यह किस धर्म को मानते हैं, कौन सी शिक्षा ग्रहण कर आये हुये लोग हैं जो एक नौजवान को सरेआम गोली दाग कर मौत के घाट उतार देते है ? इतना निर्मम , क्रूर और जघन्य आचरण!
मित्र , इस क्लिप से ये सीख लेने की जरूरत है कि अभी भी वक्त है ,संभल जाओ वर्ना भारत में भी ऐसे कांड होंगे और हमें ऐसी क्लिपें बनाने और देखने का दुर्भाग्य अपनों गाँवों , मोहल्लों और चौराहों पर आसानी से मिलेगा |
भारत मे भी यही कुछ हो रहा है मित्र बस्तर मे आदिवासी समाज सलवा जुड़ूम और नक्सलवाद के नाम पर ऐसे ही एक दूसरे के खूण का प्यासा हो गया है और इस खूनखराबे मे उम्र लिंग या संबंधो का भी लिहाज नही जो भी विरोधी खेमे का हाथ लगा उसकी मौत इससे भी बुरी तय है ।
मनमोहन ने कर दिया, ताल ठोंक ऐलान देखा होगा न कहीं, मुझ जैसा इन्सान मुझ जैसा इन्सान, घना मजबूर मैं दुखिया कहने को मैं प्रधान, नहीं हूं लेकिन मुखिया कह दानव कविराय, जगो अब मोहन भैया अर्धसत्य को त्याग, सत्य की खेवो नैया
पिछले कई दिनों से मैं कुछ अच्छी चीजें, अच्छे क्षण याद कर रहा था। जब अच्छी चीजों की या फिर कहें अच्छे क्षणों की बात करें तो निश्चित है कि बचपन की यादें उसमें अवश्य होंगी कुछ अपवादों को छोड़ कर, क्योंकि दुनिया के प्रत्येक माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चों का बचपन अच्छा गुजरे। जब मैं अपने जीवन को दोहराने बैठा तो जो कुछ स्मृतियों ने लौटाया उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अब से करीब अट्ठाइस बरस पहले, जब मेरी उम्र करीब सात वर्ष थी, की स्मृतियों में सबसे पहले जिस चीज का ध्यान आता है वह है भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी। छुक-छुक की आवाज करती हुई, धुआं निकलती हुई, कम भीड़ वाले प्लेटफार्म, कम भीड़ वाले डिब्बे। कस्बे में लगा हुआ मेला, मेले में सजी दुकानें, सर्कस, भोंपू बजाते हुए लड़के। धूल उड़ाते हुए घोड़े, बैलगाडियां, ताँगों, साइकिलों से, पैदल आते हुए लोग। प्लास्टिक के क्रूड खिलोने, प्लास्टिक का चश्मा और कांच के हरे-पीले-नीले कंचे। बाइस्कोप, बड़ा सा रेडियो, लिटाने वाला टेप-रिकॉर्डर, चाबी भरकर चलाने वाला लाउड़-स्पीकर, बड़ा सा डॉज ट्रक, मेटाडोर मिनी-बस। जावा, यज्दी और राजदूत, लैम्बी और लेम्ब्रेटा। बीच से ...
लानत है!
ReplyDeleteजिसने यह क्लिप बनाकर इन दरिन्दों को एक्सपोज़ किया, अब उसकी जान खतरे में है।
वीभत्स .....
ReplyDeleteइतना निर्मम लानत है
ReplyDeleteदिल दहल गया ....
ReplyDeleteक्रूरता की पराकाष्टा!
ReplyDeleteमित्र , इस क्लिप से ये सीख लेने की जरूरत है कि अभी भी वक्त है ,संभल जाओ वर्ना भारत में भी ऐसे कांड होंगे और हमें ऐसी क्लिपें बनाने और देखने का दुर्भाग्य अपनों गाँवों , मोहल्लों और चौराहों पर आसानी से मिलेगा |
ReplyDeleteएशियाई मुल्कों की पुलिस कुछ ज्यादा हीं बर्बर हैं।
ReplyDeleteभारत मे भी यही कुछ हो रहा है मित्र बस्तर मे आदिवासी समाज सलवा जुड़ूम और नक्सलवाद के नाम पर ऐसे ही एक दूसरे के खूण का प्यासा हो गया है और इस खूनखराबे मे उम्र लिंग या संबंधो का भी लिहाज नही जो भी विरोधी खेमे का हाथ लगा उसकी मौत इससे भी बुरी तय है ।
ReplyDeleteसम्माननीय अरुणेश जी यही तो परेशानी है कि जज,जूरी,जल्लाद सब बन जाती है पुलिस.
ReplyDeletekya kahen lanat hai esi vyavastha ko ... nirmam
ReplyDeleteजघन्य अपराध।
ReplyDeleteइस्लामी मुल्कों में सरेआम पत्थर मार-मार कर मारने की परम्परा बहुत पुरानी है। अब यह भी देखना रह गया था।
ReplyDeleteवीडियो हृदयविराक. इंसान की जान की कीमत ये !
ReplyDeleteहृदयविराक=हृदयविदारक
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