भ्रष्टाचार पर अरण्य रोदन के विषय में
बात भ्रष्टाचार की खूब चल रही है, नित नये सु/कुविचार और सु/कुतर्क भी सुनने को मिलते हैं. एक और भी विचार आजकल चलन/फैशन में है, जिसे हमारे यहां के बुद्धिजीवी ब्लाग/सोशल साइट्स और अखबारों में निरन्तर प्रकाशित कर/करवा रहे हैं. वह है कि भ्रष्टाचार के लिये भ्रष्टाचार मिटाने के लिये आम आदमी को आगे आना चाहिये और उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना चाहिये, भ्रष्टाचारी भी समाज का अंग हैं, उनका बहिष्कार होना चाहिये. यदि आप घूस देंगे नहीं तो लेने वाले को मिलेगी कैसे और आप स्वयं क्या करते हैं, नक्शे में कुछ और दिखाया जाता है, बनाया कुछ और जाता है, रजिस्ट्री कराते समय स्टाम्प कम लगे, इसलिये आप कम दाम दिखाते हैं, या फिर रेलयात्रा में सीट पाने के लिये, वगैरा वगैरा. इसमें सारी बातें सही हैं और मैं इससे सहमत भी हूं, लेकिन मैं उनके इस विचार से कतई इत्तफाक नहीं रखता कि भ्रष्टाचार इसलिये बढ़ रहा है कि आम आदमी ऊपर लिखी गयी तथा इसके अतिरिक्त इसी प्रकार की और गलत चीजों को अपनाता है तथा बढ़ावा देता है.
जैसा कि मैंने पाया है कि आम आदमी खुशी खुशी भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा तब देता है जब वह स्वयं अवैधानिक कार्य करता है जिसमें ऊपर लिखी हुई सारी बातें शामिल हैं. लेकिन जहाँ पूरा सिस्टम ही ऐसा बनाकर रख दिया गया हो जिसमें पैदा होने के प्रमाणपत्र से लेकर मरने के सर्टीफिकेट बनवाने तक पैसा देना पड़े तो कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा (अपवाद छोड़कर-जिसमें समाज के बहुत ताकतवर व्यक्ति आते हैं) जो इस कुचक्र से बच सकता है. रेलवे में रिजर्वेशन को लेकर अक्सर बड़ी बड़ी बहसें छिड जाती हैं कि आम आदमी सीट की प्राप्ति के लिए किस तरह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है. मान लीजिए कि टीटी के पास दो सीटें उपलब्ध हैं और जाने वाले आठ लोग मौजूद हैं. टीटी किसे प्राथमिकता देगा, जिससे उसे कुछ लाभ होगा (यदि टीटी उस प्रकार का है तब). अब इस स्थिति में आठों लोग ही प्रयासरत होते हैं कि कैसे भी एक सीट हासिल हो जाये. अमूमन यह होता है कि टीटी के पास जायें तो वह सीट उपलब्ध होने पर भी मना कर देता है और जाहिर है कि आम आदमी के पास यह सूचना नहीं होती कि यह बात सत्य है या नहीं. और जहाँ कोई आदमी अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु भ्रष्टाचार करने पर आमादा होता है वहाँ भी यह जिम्मेदारी शासन की होती है जिसके लोगों को अपने काम करने के लिए वेतन दिया जाता है और उनकी जिम्मेदारी बनती है जिनके कन्धों पर गलत कार्य-व्यवहार रोकने के लिए नियुक्त किया जाता है.
थोड़ी-बहुत देर बाद लोग आगे पीछे घूमते हैं तो यह देखा जाता है कि कौन सा व्यक्ति मतलब का है. अब जो व्यक्ति मतलब का है उसे आश्वासन दे दिया जाता है और बाद में सीट भी. मान लीजिए कि जो व्यक्ति सबसे पहले आया था और उस व्यक्ति को सीट न देकर बाद में आने वाले व्यक्ति को सीट दे दी गयी तो फिर ऐसे में एक ईमानदार व्यक्ति को क्या हासिल हुआ. कुछ नहीं. लोग इस पर कहते हैं कि भैया ऐसे मामलों में शिकायत करो. किससे करो? और उसका नतीजा क्या? पहली बात यह कि जिसे आवश्यकता थी और जो हक़दार था उसे सीट नहीं मिली. अब शिकायत करने के लिए अपनी जेब से बीस-तीस रुपये खर्च करो और फिर इन शिकायतों का क्या अंजाम होता है, सब जानते हैं. चूँकि इस प्रकार की शिकायतों पर यदि तुरंत कार्रवाई हो तभी कुछ सार्थक घटित हो सकता है. अब यदि व्यक्ति की रेल का समय रात का है ऐसे समय में शिकायत कौन सुनेगा जब कि सामान्य समय में भी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हो पाती.
कहीं दिक्कत संसाधनों को लेकर भी होती है. और जाहिर है कि किसी भी सरकार के लिए सबसे अच्छा बचाव हो सकता है कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं. जिस प्रकार से जनसँख्या अबाध गति से बढती जा रही है, उस हिसाब से तो कभी भी संसाधन पर्याप्त नहीं हो सकते. जनसँख्या वृद्धि->मंहगाई->भ्रष्टाचार यह सभी एक ही चक्र में समाहित हैं और एक दूसरे का कारक और कारण भी हैं. और भारत के भोले भाले लोग सियासतदानों की इन चालाकियों को समझ नहीं पाते. उन्हें इसीलिए इस चक्र में उलझाया गया है कि सुबह से शाम तक पेट भरने की ही जुगत में लगे रहें. जब दिन भर इसी में लगे रहेंगे तो और किसी चीज पर निगाह डालने का समय ही नहीं मिलेगा और फिर इन कुचर्कों में यूँ ही फँसे रहेंगे.
लोग यह भी कहते हैं कि लोकपाल के लिए कुंदन जैसा व्यक्ति कहाँ से आएगा. हमारे यहाँ तमाम संवैधानिक संस्थान हैं, न्यायपालिका है जिनमें तमाम उच्च नैतिक मानदंड अपनाने वाले लोग हुए हैं. आखिर वे भी तो यहीं से आये हैं. और फिर यदि यही माना जाए कि एक व्यक्ति भी कुंदन की तरह खरा नहीं मिल सकता तो फिर तमाम सरकारी-निजी-गैर सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग सब के सब गलत हैं. कदापि नहीं. जाने कितने लोग हैं जो आज भी पूरे ईमानदार हैं, और जो व्यक्ति ७०-८०-९० प्रतिशत भी ईमानदार है उसे सौ प्रतिशत में बदलते देर नहीं लगती. ऐसे भी लोग हैं जो पैसा लेते नहीं लेकिन उन्हें कहीं न कहीं देना पड़ जाता है तो इस तरह के लोगों को आप भ्रष्ट नहीं कह सकते. न जाने कितने महकमे ऐसे हैं जहाँ तबादले को उद्योग बना दिया गया है. और फिर इसे भ्रष्टाचार क्यों नहीं माना जाता कि कुछ पैसे वाले लोग तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और फिर उनकी मनमानी कीमत वसूल करते हैं. रियल एस्टेट में जाकर देखिये कि किस तरह किसानों की जमीन निहायत कम दामों पर खरीद ली जाती है और फिर मन-माने दामों में बेची जाती है. चीनी और अरहर का मामला सामने है जहाँ इसका स्टॉक कर लिया गया और फिर अंधाधुंध दामों पर ये वस्तुएँ बेची गयीं.
चतुर लोग माहौल को ऐसा बना देते हैं कि तन-मन-धन लुटा देने वाला आम आदमी स्वयं को ही भ्रष्टाचार का जनक मानने लगता है. अगर भ्रष्टाचार को रोकने में कठिनाई आ रही है तो फिर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही जिससे कि अवैध कमाई करने वाला उसे खर्च न कर सके. जब अवैध रूप से कमाया गया धन व्यय ही नहीं किया जा सकेगा तो फिर उसे कमाएगा कौन और क्यों. यह मानना ही पड़ेगा कि देश में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी महँगाई के पीछे भी यही काला धन है. लेकिन संसद में क्या हुआ सब के सामने आ चुका है. श्रीमान राम जेठमलानी जी के भाषण में जो विषय उठाये गए वे बहुत महत्वपूर्ण थे लेकिन!
कहीं दिक्कत संसाधनों को लेकर भी होती है. और जाहिर है कि किसी भी सरकार के लिए सबसे अच्छा बचाव हो सकता है कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं. जिस प्रकार से जनसँख्या अबाध गति से बढती जा रही है, उस हिसाब से तो कभी भी संसाधन पर्याप्त नहीं हो सकते. जनसँख्या वृद्धि->मंहगाई->भ्रष्टाचार यह सभी एक ही चक्र में समाहित हैं और एक दूसरे का कारक और कारण भी हैं. और भारत के भोले भाले लोग सियासतदानों की इन चालाकियों को समझ नहीं पाते. उन्हें इसीलिए इस चक्र में उलझाया गया है कि सुबह से शाम तक पेट भरने की ही जुगत में लगे रहें. जब दिन भर इसी में लगे रहेंगे तो और किसी चीज पर निगाह डालने का समय ही नहीं मिलेगा और फिर इन कुचर्कों में यूँ ही फँसे रहेंगे.
लोग यह भी कहते हैं कि लोकपाल के लिए कुंदन जैसा व्यक्ति कहाँ से आएगा. हमारे यहाँ तमाम संवैधानिक संस्थान हैं, न्यायपालिका है जिनमें तमाम उच्च नैतिक मानदंड अपनाने वाले लोग हुए हैं. आखिर वे भी तो यहीं से आये हैं. और फिर यदि यही माना जाए कि एक व्यक्ति भी कुंदन की तरह खरा नहीं मिल सकता तो फिर तमाम सरकारी-निजी-गैर सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग सब के सब गलत हैं. कदापि नहीं. जाने कितने लोग हैं जो आज भी पूरे ईमानदार हैं, और जो व्यक्ति ७०-८०-९० प्रतिशत भी ईमानदार है उसे सौ प्रतिशत में बदलते देर नहीं लगती. ऐसे भी लोग हैं जो पैसा लेते नहीं लेकिन उन्हें कहीं न कहीं देना पड़ जाता है तो इस तरह के लोगों को आप भ्रष्ट नहीं कह सकते. न जाने कितने महकमे ऐसे हैं जहाँ तबादले को उद्योग बना दिया गया है. और फिर इसे भ्रष्टाचार क्यों नहीं माना जाता कि कुछ पैसे वाले लोग तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और फिर उनकी मनमानी कीमत वसूल करते हैं. रियल एस्टेट में जाकर देखिये कि किस तरह किसानों की जमीन निहायत कम दामों पर खरीद ली जाती है और फिर मन-माने दामों में बेची जाती है. चीनी और अरहर का मामला सामने है जहाँ इसका स्टॉक कर लिया गया और फिर अंधाधुंध दामों पर ये वस्तुएँ बेची गयीं.
चतुर लोग माहौल को ऐसा बना देते हैं कि तन-मन-धन लुटा देने वाला आम आदमी स्वयं को ही भ्रष्टाचार का जनक मानने लगता है. अगर भ्रष्टाचार को रोकने में कठिनाई आ रही है तो फिर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही जिससे कि अवैध कमाई करने वाला उसे खर्च न कर सके. जब अवैध रूप से कमाया गया धन व्यय ही नहीं किया जा सकेगा तो फिर उसे कमाएगा कौन और क्यों. यह मानना ही पड़ेगा कि देश में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी महँगाई के पीछे भी यही काला धन है. लेकिन संसद में क्या हुआ सब के सामने आ चुका है. श्रीमान राम जेठमलानी जी के भाषण में जो विषय उठाये गए वे बहुत महत्वपूर्ण थे लेकिन!
सही कह रहे हैं आप. हम लोग भी जब यहाँ से भारत जाते हैं तो सारे काम एकदम नियम कानून से करने का भूत चड़ा होता है. और यह कहते हुए मुझे बेहद दुःख होता है कि यह भूत एक हफ्ते में ही उतर जाता है क्योंकि वहाँ कोई भी काम (एक रेलवे का टिकेट बुक करने जैसा भी) ..सीधे तरीके से नहीं हो पाता.
ReplyDeleteआपके आलेख के किसी भी बिन्दु से असहमत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। भ्रष्ट शक्तिशाली अधिकारी अपने आधिकारिक बल के द्वारा अपने स्वार्थ को हर प्रकार के व्यक्ति पर थोपता है। गिने-चुने लोग ऐसे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग भी लड़ते हैं परंतु अलग-थलग पड़ जाते हैं। कुछ लोग मजबूरी में भ्रष्टाचार को हवा देते हैं जबकि अपराधी प्रवृत्ति के लोग ऐसी बुराइयों के साथ मिलकर फ़ायदा उठाते हैं। दुख यह है कि कई बार ईमानदार लोग भी अज्ञानवश ऐसे लोगों के भ्रष्ट अचीवमेंट्स का विरोध करने के बजाय बधाई देने और उनकी हार पर मानवतावश सहानुभूति करने पहुँच जाते हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है जब सज्जन वर्ग न केवल सशक्त और संगठित हो वह यह भी पहचाने कि अपने फ़ायदे के लिये ईमानदारी का राग अलापने वाला हर व्यक्ति भी ईमानदार नहीं होता। बहुत सुन्दर आलेख। आपके मन की व्यथा लाखों ईमानदारों की व्यथा है।
ReplyDeleteनववर्ष की शुभकामनायें!
ReplyDeleteआपके आलेख के किसी भी बिन्दु से असहमत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। भ्रष्ट शक्तिशाली अधिकारी अपने आधिकारिक बल के द्वारा अपने स्वार्थ को हर प्रकार के व्यक्ति पर थोपता है। गिने-चुने लोग ऐसे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग भी लड़ते हैं परंतु अलग-थलग पड़ जाते हैं। कुछ लोग मजबूरी में भ्रष्टाचार को हवा देते हैं जबकि अपराधी प्रवृत्ति के लोग ऐसी बुराइयों के साथ मिलकर फ़ायदा उठाते हैं। दुख यह है कि कई बार ईमानदार लोग भी अज्ञानवश ऐसे लोगों के भ्रष्ट अचीवमेंट्स का विरोध करने के बजाय बधाई देने और उनकी हार पर मानवतावश सहानुभूति करने पहुँच जाते हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है जब सज्जन वर्ग न केवल सशक्त और संगठित हो वह यह भी पहचाने कि अपने फ़ायदे के लिये ईमानदारी का राग अलापने वाला हर व्यक्ति भी ईमानदार नहीं होता। बहुत सुन्दर आलेख। आपके मन की व्यथा लाखों ईमानदारों की व्यथा है।
ReplyDeleteआपकी तमाम बातों से सहमत! बहुत कठिन है डगर पनघट की! :(
ReplyDeletevah to suvidha shulk hai .
ReplyDeleteव्यवस्थायें पारदर्शी और सरल बनाने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, ढेरों तन्त्र ऐसे हैं जो पारदर्शिता के कारण ही भ्रष्टाचार के चुंगुल से निकल पाये हैं।
ReplyDeleteआम आदमी को कोई भी काम करवाने के लिए अलग से चढ़ावा चढाने की आवश्यकता क्यों कर पैदा हुई. इसके लिए वे कैसे दोषी माने जा सकते है. आपसे पूरी तरह सहमत. प्रवीण पण्डे जी से भी सहमत.
ReplyDeleteहर शाख पे उल्लू बैठा है
ReplyDeleteअंजाम ए गुलिस्तान क्या होगा ?..उतिष्ठकौन्तेय
हमारी प्रोग्रामिंग इतनी ख़राब हो चुकी है कि पूरी एक पीढ़ी चाहिए वांछित माहौल के लिए। क्यों न हम इस पोस्ट के संदेशों के साथ हम नववर्ष में प्रवेश करें!
ReplyDeleteआपसे सहमत.
ReplyDeleteये ही बात मैंने कई बार विभिन्न ब्लोगों पर कही भी हैं.वैसे भी आम आदमी के रहनुमाओं की ज्यादा बडी जिम्मेदारी बनती है.
आपको और परिवारजनों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.
ReplyDeleteप्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । नव वर्ष की अशेष शुभकामनाएं । धन्यवाद ।
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDelete@अनवर जमाल जी-रुमाल और चादर के विषय में थोडा विस्तार से बताएं.
ReplyDelete@अनवर जमाल जी-रुमाल और चादर के विषय में थोडा विस्तार से बताएं.
ReplyDeleteके विषय में
♥ कुछ देर के लिए मालिक का नाम जपना या उसका ध्यान करना एक ऐसा काम है जिसमें मेहनत कम है जबकि पूरे जीवन को उसकी मर्जी के मुताबिक़ ढालना एक बड़ा काम है . छोटे काम का फल छोटा और बड़े काम का फल बड़ा होता है ,
जैसे कि रूमाल से केवल सर ढका जा सकता है जबकि चादर पूरे शरीर को ढक सकती है.
भ्रष्टाचार के विषय में और खासकर आम आदमी के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में जितनी बातें आपने कहीं उसमें किसी तरह का विरोध नहीं है.. दरसल पारदर्शिता का अभाव अज्ञानता पैदा करता है व्यवस्था के प्रति और अज्ञानता से जन्म होता है भ्रष्टाचार का..
ReplyDeleteआपने रेलवे का उदाहरण दिया है.. याद करें वे दिन जब एक बुकिंग क्लर्क की खुशामद से सीट पाने का कार्यक्रम शुरू होता था जो ट्रेन में टीटी की खुशामद तक जाता था.. जबसे नेट पर यह सुविधा उपलाब्ध हुयी, इसमें उस समय की तुलना में कमी आई है.. (समाप्त हुआ ऐसा नहीं है).. मैं बैंक में काम करता हूँ... हमारे नियमों में परिवर्तन हमारे पास आने से पहले ग्राहकों के पास होते हैं.. इसलिए नियम की आड़ में होने वाले भ्रष्टाचार नहीं हैं.. (मुक्त तो यह व्यवस्था भी नहीं)... इनकम टैक्स विभाग से जब नोटिस मिलाती है तो नोटिस भेजने वाला यह नहीं बताता कि किस आधार पर नोटिस भेजी है, यह आपको बताना है कि आपने सही टैक्स जमा करवाया है.. मिलिए, खर्च कीजिये तो सारा हिसाब ठीक...!!
अवैध रूप से कमाए गए धन के व्यय पर रोक लग सके तो लोग स्वयं ही इससे दूर हो जायेंगे! एक सार्थक समाधान ----आभार --- आपको एवं आपके परिवार को नए वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं !
ReplyDelete@अनवर जमाल जी- कृपया इस रूमाल और चादर के विषय में पूर्ण विस्तार से बताएं. आपके उत्तर की प्रतीक्षा है.
ReplyDeleteबिलकुल ठीक कहा जमाल साहब. जब आदमी ईश्वर के प्रति लीन हों जाता है तो उसे फिर यह नहीं दिखाई देता कि मस्जिद कहाँ और मंदिर कहाँ. जाकी रही भावना जैसी....आप मंदिर में भगवान राम में अपने निराकार ईश्वर के वुजूद को खोज सकते हैं. अगर लक्ष्य एक है तो रास्ते की परवाह क्या. एक वक्त या एक से अनेक वक्त की प्रार्थना और राम नाम का सुमिरन. अगर पहुंचना एक जगह है तो रास्ता जिसे जो बढ़िया लगे. ये कोई दुकान जैसा थोड़े ही है कि मेरा माल तुम्हारे से अधिक बढ़िया.
ReplyDelete@अनवर जी-आपके कमेन्ट बड़े ही सुन्दर हैं, कृपया आगे के भाग में और जानकारी दें. ताकि इस विषय पर और बात की जा सके.
ReplyDeleteदुर्भाग्य है देश का ... जनता को अफीम खिला खिला के निढाल बना दिया गया है ...
ReplyDeleteआपको वन वर्ष की मंगल कामनाएं ...
आभार!! इस गम्भीर चिन्तन के लिए!!
ReplyDeleteबुराईयां और अच्छाईयां जगत में सदैव ही विद्यमान रही है। प्रश्न यह है कि लोग किस प्रकार बुराई से दूर रहे और अच्छाई ही अपनाए।