क्षुब्ध हूं, पुलिस के इन कारनामों को देखकर...
लगभग हर रोज ही अखबारों में पुलिस वालों की ज्यादती के किस्से पढने को मिल जाते हैं. अपराधों की रिपोर्ट न लिखना तो रोजमर्रा की बात बन चुकी है. फर्जी एनकाउन्टरों के किस्से अखबारों में खूब मिलते हैं. एक बार तो एक "अपराधी" का लाइव एनकाउन्टर भी देखने में आया, जिसे पुलिस वाले दौड़ने को कहते हैं और पीछे से एके-४७ का बर्स्ट खोल देते हैं. जज की तरह काम करना प्रिय शगल बन चुका है पुलिस वालों का. कुछ दिनों पहले एक घटना का जिक्र अखबार में था कि बस लूट ली गई और जब रिपोर्ट दर्ज कराने ड्राइवर और कंडक्टर थाने गये तो थानेदार ने लूटी गयी रकम पूछी और जितनी रकम लुटी थी उतनी देकर विदा कर दिया. लखनऊ में एक रैली में एक डीआईजी साहब को एक व्यक्ति को जूतों से रौंदते हुये देखा जा चुका है. उसी पुलिस के एक सिपाही को मेरठ में किसी नेता ने जमकर पीटा और पुलिस की हिम्मत नहीं हुई अपने सिपाही को बचाने की. उसी पुलिस के वीर अफसर ने वीरता दिखाते हुये महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ट्रेनी महिला सिपाहियों का यौन शोषण किया और उसके बाद एक लड़की की मेडिकल रिपोर्ट तक बदलवा दी, पहले की दो रिपोर्ट में वह लड़की गर्भवती थी और आखिरी...
:( क्या कहें ....
ReplyDeleteसही जा रहे हैं, हिन्दी अखबार भी।
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ReplyDeleteआपका पैनी नजर का जवाब नहीं!
ReplyDeleteभगवान इन्हें सद्बुद्धि दे।
ReplyDeleteमीडिया से लेकर फिल्मों तक हिन्दी की टांग तोडी जा रही है। समाचार चैनलों पर स्क्रॉल करते हिन्दी हेडलाइन्स पर गौर करें तो बहुत सी गलतियां मिल जायेंगी। वहीं टीवी सीरियल या हिन्दी फिल्मों में अगर कास्टिंग को देखें तो मौर्य को मौर्या, नीरज को निरज जैसी गलतियां आम हैं।
ReplyDeleteअच्छा हुआ जो श की जगह स नहीं लिखा
ReplyDeleteधन्यवाद
गलती से सही हिन्दी लिखने का पहला मामला प्रकाश में आया है :)
ReplyDeleteअरे एक ढूंढो हजार मिलती हैं यही दुर्भाग्य है हिंदी का.:(
ReplyDeleteइस पेज में हकीकत है या कलम का कमाल?
ReplyDeleteजो भी हो, ठीक ही तो है।
गलती या जानबूझ कर बढिया है।
और उसपे दावा की हम हिन्दी भाषी हैं ... जै हो ...
ReplyDeleteमजे हैं अखबारों के भी! :)
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