अब यह भाग्यशाली "शाली" कौन हैं, पता नहीं, लेकिन लगता है "शीला" को ही "शाली" लिख दिया और "सुपर" को "सपर" लिख दिया गया है. खबर का शीर्षक देखिये. ऐसी छोटी-मोटी गलतियां तो हिन्दी में, हिन्दी के साथ, हिन्दी वालों के साथ हो ही जाती हैं.
मीडिया से लेकर फिल्मों तक हिन्दी की टांग तोडी जा रही है। समाचार चैनलों पर स्क्रॉल करते हिन्दी हेडलाइन्स पर गौर करें तो बहुत सी गलतियां मिल जायेंगी। वहीं टीवी सीरियल या हिन्दी फिल्मों में अगर कास्टिंग को देखें तो मौर्य को मौर्या, नीरज को निरज जैसी गलतियां आम हैं।
मनमोहन ने कर दिया, ताल ठोंक ऐलान देखा होगा न कहीं, मुझ जैसा इन्सान मुझ जैसा इन्सान, घना मजबूर मैं दुखिया कहने को मैं प्रधान, नहीं हूं लेकिन मुखिया कह दानव कविराय, जगो अब मोहन भैया अर्धसत्य को त्याग, सत्य की खेवो नैया
पिछले कई दिनों से मैं कुछ अच्छी चीजें, अच्छे क्षण याद कर रहा था। जब अच्छी चीजों की या फिर कहें अच्छे क्षणों की बात करें तो निश्चित है कि बचपन की यादें उसमें अवश्य होंगी कुछ अपवादों को छोड़ कर, क्योंकि दुनिया के प्रत्येक माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चों का बचपन अच्छा गुजरे। जब मैं अपने जीवन को दोहराने बैठा तो जो कुछ स्मृतियों ने लौटाया उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अब से करीब अट्ठाइस बरस पहले, जब मेरी उम्र करीब सात वर्ष थी, की स्मृतियों में सबसे पहले जिस चीज का ध्यान आता है वह है भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी। छुक-छुक की आवाज करती हुई, धुआं निकलती हुई, कम भीड़ वाले प्लेटफार्म, कम भीड़ वाले डिब्बे। कस्बे में लगा हुआ मेला, मेले में सजी दुकानें, सर्कस, भोंपू बजाते हुए लड़के। धूल उड़ाते हुए घोड़े, बैलगाडियां, ताँगों, साइकिलों से, पैदल आते हुए लोग। प्लास्टिक के क्रूड खिलोने, प्लास्टिक का चश्मा और कांच के हरे-पीले-नीले कंचे। बाइस्कोप, बड़ा सा रेडियो, लिटाने वाला टेप-रिकॉर्डर, चाबी भरकर चलाने वाला लाउड़-स्पीकर, बड़ा सा डॉज ट्रक, मेटाडोर मिनी-बस। जावा, यज्दी और राजदूत, लैम्बी और लेम्ब्रेटा। बीच से ...
:( क्या कहें ....
ReplyDeleteसही जा रहे हैं, हिन्दी अखबार भी।
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ReplyDeleteआपका पैनी नजर का जवाब नहीं!
ReplyDeleteभगवान इन्हें सद्बुद्धि दे।
ReplyDeleteमीडिया से लेकर फिल्मों तक हिन्दी की टांग तोडी जा रही है। समाचार चैनलों पर स्क्रॉल करते हिन्दी हेडलाइन्स पर गौर करें तो बहुत सी गलतियां मिल जायेंगी। वहीं टीवी सीरियल या हिन्दी फिल्मों में अगर कास्टिंग को देखें तो मौर्य को मौर्या, नीरज को निरज जैसी गलतियां आम हैं।
ReplyDeleteअच्छा हुआ जो श की जगह स नहीं लिखा
ReplyDeleteधन्यवाद
गलती से सही हिन्दी लिखने का पहला मामला प्रकाश में आया है :)
ReplyDeleteअरे एक ढूंढो हजार मिलती हैं यही दुर्भाग्य है हिंदी का.:(
ReplyDeleteइस पेज में हकीकत है या कलम का कमाल?
ReplyDeleteजो भी हो, ठीक ही तो है।
गलती या जानबूझ कर बढिया है।
और उसपे दावा की हम हिन्दी भाषी हैं ... जै हो ...
ReplyDeleteमजे हैं अखबारों के भी! :)
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