कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
अफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
लगभग हर रोज ही अखबारों में पुलिस वालों की ज्यादती के किस्से पढने को मिल जाते हैं. अपराधों की रिपोर्ट न लिखना तो रोजमर्रा की बात बन चुकी है. फर्जी एनकाउन्टरों के किस्से अखबारों में खूब मिलते हैं. एक बार तो एक "अपराधी" का लाइव एनकाउन्टर भी देखने में आया, जिसे पुलिस वाले दौड़ने को कहते हैं और पीछे से एके-४७ का बर्स्ट खोल देते हैं. जज की तरह काम करना प्रिय शगल बन चुका है पुलिस वालों का. कुछ दिनों पहले एक घटना का जिक्र अखबार में था कि बस लूट ली गई और जब रिपोर्ट दर्ज कराने ड्राइवर और कंडक्टर थाने गये तो थानेदार ने लूटी गयी रकम पूछी और जितनी रकम लुटी थी उतनी देकर विदा कर दिया. लखनऊ में एक रैली में एक डीआईजी साहब को एक व्यक्ति को जूतों से रौंदते हुये देखा जा चुका है. उसी पुलिस के एक सिपाही को मेरठ में किसी नेता ने जमकर पीटा और पुलिस की हिम्मत नहीं हुई अपने सिपाही को बचाने की. उसी पुलिस के वीर अफसर ने वीरता दिखाते हुये महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ट्रेनी महिला सिपाहियों का यौन शोषण किया और उसके बाद एक लड़की की मेडिकल रिपोर्ट तक बदलवा दी, पहले की दो रिपोर्ट में वह लड़की गर्भवती थी और आखिरी...
एक दिन प्रात: जब मैंने मार्निंग वाक को कदम बढ़ाया तो पाया कि नगर का चौकीदार राम लुभाया जो चौदह साल से नहीं दिया था दिखाई झाड़ू लगा रहा था मेरे भाई थोड़ा और आगे बढ़ा दिमाग का बल्ब झक्क से उडा नजारा अजब था माहौल कुछ गजब था तोता राम नाम का ट्रैफिक सिपाही जो करता था दिन भर उगाही बड़े कायदे से पेश आ रहा था रिक्शे वाले को भी भाई-साहब कह कर बुला रहा था मैंने अपने दिल को कड़ा किया और धड़कते दिल के साथ कदमों को बढ़ा दिया आगे चला तो पाया कि लोग बड़े कायदे से आ-जा रहे थे ऑटो वाले भी अठारह की जगह आठ सवारी बैठा रहे थे लोगों ने हटा दिए थे अपने घरों के सामने के नाजायज ग्रिल देखकर चेहरा हमारा उठा खिल घर पंहुचते ही लगा जोर का झटका दिमाग सातवें आसमान में जा लटका पानी अभी तक आ रहा था बिजली का बल्ब भी मुस्कुरा रहा मैंने थोड़ा और साहस जुटाया और फिर अखबार की ओर हाथ बढाया पहली हेड-लाइन को पढ़ते ही माथा ठनक गया मैं तो इसे देखते ही अटक गया शीर्षक था-कल शिक्षकों ने आखिरी घंटे तक पढाया १०० डायल करने पर पुलिस वाला बडी भद्रता से पेश आया आगे लिखा था सरकारी स्कूलों में हुयी पढ़ाई रेल-गाडियां भी आज टाइम पर आईं सरकारी अस्प...
हे ईश्वर क्या हो गया है इन मीडिया वालों को? अब बेचारे सुब्बा जी के पीछे पड़ गए कि सुब्बा जी यहाँ पैदा नहीं हुए, ऊपर से सीबीआई ने कोर्ट में कह दिया कि उनके द्वारा लगाये गए तमाम कागजात नकली हैं. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ पैदा हुआ, यहाँ हुआ या नेपाल हुआ, कहीं न कहीं तो पैदा होना ही था. कल को लोग कहने लगेंगे कि भाई तू अस्पताल में पैदा क्यों न हुआ या फिर अस्पताल में हुआ तो फलां अस्पताल में क्यों न हुआ और अगर फलां में हुआ तो फलां टाइम पर क्यों न हुआ. तो बात हो रही थी पैदा होने की, यहाँ के लोगों की फितरत ही कुछ ऐसी है कि पैदा होने को लेकर खाम-खां शोर मचाने लगते हैं, बेचारी सोनिया जी को भी इन्हीं लोगों के कारण त्याग करना पड़ा नहीं तो आज सोनिया जी प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित कर रही होतीं. सुब्बा जी के विरोधियों की यह साजिश है. बेचारे दो बार विधायक और तीन बार ही सांसद बन पाये थे कि यार लोगों ने बवाल मचा दिया. अब मजदूरी करना, लाटरी से पैसा कमाना, ठेकेदारी करना कोई गुनाह है क्या. इतने बांग्लादेशी आ गए, पाकिस्तान से लोग मैच देखने आए, यहीं रह गए, उनके लिए कोई कुछ नहीं कहता, बेचारे सुब्बा...
गुंजाइश तो नहीं , लेकिन ह्रदय जब व्यथित होता है तो लोग क्रान्ति कि उम्मीद कर बैठते हैं और तत्पर भी रहते हैं
ReplyDeleteकोई मरे कोई जिये,
ReplyDeleteसुथरा घोल बताशे पिये.
कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
ReplyDeleteजख्मों में नमक।
ReplyDeleteकफ़न उतारने वाले केवल शमशानों में ही नहीं होते...
ReplyDeleteलानत है ऐसे कफनचोरों पर।
ReplyDeleteक्या कहें..... शर्म आती है यह सब जानकर .....कैसी क्रांति और कैसा बदलाव .......
ReplyDeleteहलवाई को मीठे की परवाह कम ही होती है.
ReplyDeleteयहाँ, बिने दिये एक साईन नही होते आपको तो फिर भी रिपोर्ट की कापी चाहिए थी।
ReplyDeleteगुंजाईश तो है, जरूरत है बस लठ्ठ उठाने की।
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
ReplyDeleteसबसे महत्वपूर्ण आपकी टिप्पणी लगी , सबको सब पता है , बस जो इन पर कार्यवाही कर सकते हैं , सिर्फ उन्हें ही पता नहीं होता !
ReplyDeleteअफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
ReplyDeleteगुंजाईश हमें ही पैदा करनी होगी हमें ही इस बारे में प्रयास करना होगा.हम केवल सरकार से उम्मीद लगाकर नहीं रह सकते हमारे एकजुट होने का वक्त आ गया है.
ReplyDeleteयह तो रिपोर्ट लेने के है उससे पहले पोस्टमार्टम के समय भी तो रुपये देने पडते है ........ फ़ैशन के युग मे क्रान्ति की बात बेमानी लगती है
ReplyDeleteSach mein koi gunjaaish nahi hai ...
ReplyDeleteनव-संवत्सर और विश्व-कप दोनो की हार्दिक बधाई .
ReplyDeleteक्रांति के लिए इससे आदर्श स्थिति भला और क्या होगी!
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