कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
अफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
चुनाव आयोग ने मतदाताओं को अधिक मतदान हेतु प्रेरित करने के लिए अपने एम्बेसडर नियुक्त किये हैं जो विभिन्न नगरों का दौरा कर मतदाताओं को प्रोत्साहित करने का कार्य कर रहे हैं. एक दो नेताओं के भी बयान समाचारपत्रों में पढ़ने को मिले हैं जिसमें उन्होंने अधिकाधिक मतदान करने की अपील की है. १. क्या जनप्रतिनिधि चुनना विवाह करने से कम महत्वपूर्ण कार्य है, क्योंकि एक व्यस्क पुरुष को विवाह करने के लिए कम से कम २१ वर्ष का होना आवश्यक है जबकि सरकार बनाने के लिए जनप्रतिनिधि को चुनने के लिए विवाह की उम्र से ३ वर्ष कम होना पर्याप्त है. २. मतदान का प्रतिशत न्यूनतम ३५ से अधिकतम ६० रहता है. अब इसे और सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि डाले गए मतों में से अधिकांश मत ३-४ प्रत्याशियों के मध्य बंट जाते हैं. जिसमें से पुनः देखने पर ज्ञात होता है कि जो प्रत्याशी १५-२५ प्रतिशत मत पा जाता है वह विजयी बन जाता है. ३. अब यदि बहुमत की प्रक्रिया को माना जाए तो ५१ = १०० होना चाहिये, लेकिन यहाँ स्थिति यह है कि १५ से २५ = १००. आगे फिर देखें तो पता चलता है कि सदन में जिस या जिन दलों के पास निर्वाचित प...
खबर पढ़ रहा था कि सिलीगुड़ी में एक तेंदुआ जंगलों से भटककर आ गया. इसी प्रकार मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री के निवास के पास भी एक तेंदुआ पकड़ा गया. महाराष्ट्र में भी ऐसी कई घटनायें हुई हैं. कारण है कि भारत में मनुष्यों की आबादी तेजी से बढ़वाई जा रही है, जिन्हें रहने के लिये घर चाहिये तो उसके लिये खेतों का नाश किया जाता है और जब खाना चाहिये तो जंगल काटकर खेत बनाये जाते हैं. अब ऐसे पशु-पक्षी कहां जायें जिनका गुजारा ही जंगलों से होना है, नतीजा होता है कि वे कभी-कभी शहरों की तरफ आ जाते हैं और फिर जो सौभाग्यशाली होते हैं, वे पकड़ लिये जाते हैं जीवित. तथा जिनका भाग्य अच्छा नहीं होता वे सिलीगुड़ी वाले तेंदुये की तरह मारे जाते हैं. इतने बड़े देश में आजादी के चौंसठ साल बाद भी हमारे पास ऐसे प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं जो एक तेंदुये पर उचित मात्रा में ट्रैक्वलाइजर का प्रयोग कर उसे बेहोश कर पकड़ सकें. मैं अभी चित्र देख रहा था जहां उस पर बंदूकों से ऐसे हमला किया जा रहा था वैसा तो किसी आतंकवादी पर भी नहीं किया जाता होगा. मैं तो उन लोगों को धन्य कहता हूं जो विदेशी हैं किन्तु मानवीय जानों के साथ, अन्य प्राणियों...
गुंजाइश तो नहीं , लेकिन ह्रदय जब व्यथित होता है तो लोग क्रान्ति कि उम्मीद कर बैठते हैं और तत्पर भी रहते हैं
ReplyDeleteकोई मरे कोई जिये,
ReplyDeleteसुथरा घोल बताशे पिये.
कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
ReplyDeleteजख्मों में नमक।
ReplyDeleteकफ़न उतारने वाले केवल शमशानों में ही नहीं होते...
ReplyDeleteलानत है ऐसे कफनचोरों पर।
ReplyDeleteक्या कहें..... शर्म आती है यह सब जानकर .....कैसी क्रांति और कैसा बदलाव .......
ReplyDeleteहलवाई को मीठे की परवाह कम ही होती है.
ReplyDeleteयहाँ, बिने दिये एक साईन नही होते आपको तो फिर भी रिपोर्ट की कापी चाहिए थी।
ReplyDeleteगुंजाईश तो है, जरूरत है बस लठ्ठ उठाने की।
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
ReplyDeleteसबसे महत्वपूर्ण आपकी टिप्पणी लगी , सबको सब पता है , बस जो इन पर कार्यवाही कर सकते हैं , सिर्फ उन्हें ही पता नहीं होता !
ReplyDeleteअफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
ReplyDeleteगुंजाईश हमें ही पैदा करनी होगी हमें ही इस बारे में प्रयास करना होगा.हम केवल सरकार से उम्मीद लगाकर नहीं रह सकते हमारे एकजुट होने का वक्त आ गया है.
ReplyDeleteयह तो रिपोर्ट लेने के है उससे पहले पोस्टमार्टम के समय भी तो रुपये देने पडते है ........ फ़ैशन के युग मे क्रान्ति की बात बेमानी लगती है
ReplyDeleteSach mein koi gunjaaish nahi hai ...
ReplyDeleteनव-संवत्सर और विश्व-कप दोनो की हार्दिक बधाई .
ReplyDeleteक्रांति के लिए इससे आदर्श स्थिति भला और क्या होगी!
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