कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
अफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
मनमोहन ने कर दिया, ताल ठोंक ऐलान देखा होगा न कहीं, मुझ जैसा इन्सान मुझ जैसा इन्सान, घना मजबूर मैं दुखिया कहने को मैं प्रधान, नहीं हूं लेकिन मुखिया कह दानव कविराय, जगो अब मोहन भैया अर्धसत्य को त्याग, सत्य की खेवो नैया
पिछले कई दिनों से मैं कुछ अच्छी चीजें, अच्छे क्षण याद कर रहा था। जब अच्छी चीजों की या फिर कहें अच्छे क्षणों की बात करें तो निश्चित है कि बचपन की यादें उसमें अवश्य होंगी कुछ अपवादों को छोड़ कर, क्योंकि दुनिया के प्रत्येक माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चों का बचपन अच्छा गुजरे। जब मैं अपने जीवन को दोहराने बैठा तो जो कुछ स्मृतियों ने लौटाया उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अब से करीब अट्ठाइस बरस पहले, जब मेरी उम्र करीब सात वर्ष थी, की स्मृतियों में सबसे पहले जिस चीज का ध्यान आता है वह है भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी। छुक-छुक की आवाज करती हुई, धुआं निकलती हुई, कम भीड़ वाले प्लेटफार्म, कम भीड़ वाले डिब्बे। कस्बे में लगा हुआ मेला, मेले में सजी दुकानें, सर्कस, भोंपू बजाते हुए लड़के। धूल उड़ाते हुए घोड़े, बैलगाडियां, ताँगों, साइकिलों से, पैदल आते हुए लोग। प्लास्टिक के क्रूड खिलोने, प्लास्टिक का चश्मा और कांच के हरे-पीले-नीले कंचे। बाइस्कोप, बड़ा सा रेडियो, लिटाने वाला टेप-रिकॉर्डर, चाबी भरकर चलाने वाला लाउड़-स्पीकर, बड़ा सा डॉज ट्रक, मेटाडोर मिनी-बस। जावा, यज्दी और राजदूत, लैम्बी और लेम्ब्रेटा। बीच से ...
गुंजाइश तो नहीं , लेकिन ह्रदय जब व्यथित होता है तो लोग क्रान्ति कि उम्मीद कर बैठते हैं और तत्पर भी रहते हैं
ReplyDeleteकोई मरे कोई जिये,
ReplyDeleteसुथरा घोल बताशे पिये.
कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल पर स्टिंग देखा था की पोस्मार्टम करने के लिए पैसे मांगे जा रहे थे नहीं तो वो कई दिनी तक उस बॉडी का पोस्मार्टम नहीं करते थे और परिजनों को परेशानी होती थी साथ ही बॉडी को ख़राब होने से बचने के लिए एक लेप लगाया जाता है उसे लगाने के लिए भी हजारो रुपये परिजनों से लिया जाता था |
ReplyDeleteजख्मों में नमक।
ReplyDeleteकफ़न उतारने वाले केवल शमशानों में ही नहीं होते...
ReplyDeleteलानत है ऐसे कफनचोरों पर।
ReplyDeleteक्या कहें..... शर्म आती है यह सब जानकर .....कैसी क्रांति और कैसा बदलाव .......
ReplyDeleteहलवाई को मीठे की परवाह कम ही होती है.
ReplyDeleteयहाँ, बिने दिये एक साईन नही होते आपको तो फिर भी रिपोर्ट की कापी चाहिए थी।
ReplyDeleteगुंजाईश तो है, जरूरत है बस लठ्ठ उठाने की।
@अंशुमाला जी-पत्रकारों को भी सब मालूम रहता है, स्टिंग आपरेशन अवश्य पहली बार हुआ है. ये पत्रकार रोज पोस्टमार्टम हाउस जाते हैं और ये सब देखते हैं. यही हाल चिकित्सा अधीक्षक और पुलिस-प्रशासनिक अफसरों का है.
ReplyDeleteसबसे महत्वपूर्ण आपकी टिप्पणी लगी , सबको सब पता है , बस जो इन पर कार्यवाही कर सकते हैं , सिर्फ उन्हें ही पता नहीं होता !
ReplyDeleteअफ़सोस कि सिर्फ पोस्ट-मोरटम करने वाले ही नहीं, अपितु पूरा देश ही कफ़न चोर है ! और कुछ नहीं होना क्योंकि एक-दो होते तो उन्हें सुधारते , १२५ करोड़ को कौन सुधारेगा ?
ReplyDeleteगुंजाईश हमें ही पैदा करनी होगी हमें ही इस बारे में प्रयास करना होगा.हम केवल सरकार से उम्मीद लगाकर नहीं रह सकते हमारे एकजुट होने का वक्त आ गया है.
ReplyDeleteयह तो रिपोर्ट लेने के है उससे पहले पोस्टमार्टम के समय भी तो रुपये देने पडते है ........ फ़ैशन के युग मे क्रान्ति की बात बेमानी लगती है
ReplyDeleteSach mein koi gunjaaish nahi hai ...
ReplyDeleteनव-संवत्सर और विश्व-कप दोनो की हार्दिक बधाई .
ReplyDeleteक्रांति के लिए इससे आदर्श स्थिति भला और क्या होगी!
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