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ब्लॉग को टॉप पर रखने का नायाब तरीका.

प्रिय ब्लॉगर बंधुओं, मेरे ब्लॉग को बहुत कम लोग देखते थे और मैं अन्दर ही अन्दर कुंठित रहने लगा था कि जब अन्य ब्लागरों के ब्लॉग प्रतिदिन बीस के हिसाब से पढ़े जा रहे हैं और पन्द्रह - सोलह टिप्पणियां आ रहीं हैं तो फिर मेरा ब्लॉग क्यों नहीं टिप्पन्याया जा रहा है। मुझे बड़ी दिक्कत होने लगी अब यहाँ ऐसा भी नहीं हो पता है कि मैं दूसरे ब्लॉगर की वाहवाही करूँ और वह मेरी, अगर आमने सामने होते तो बात और होती, अब क्या पता वह ब्लॉगर कहाँ बैठा है जिसके ब्लॉग पर मैंने बढ़िया टिप्पणी लिखी है, उसका हाथ पकड़कर अपने ब्लॉग पर टिप्पणी तो लिखवाई नहीं जा सकती। इसलिए मैंने एक नया तरीका निकाला अपने ब्लॉग को टॉप में रखने का, आशा करता हूँ कि आप भी इससे लाभान्वित होंगे। १-सबसे पहले बीस पच्चीस ईमेल एड्रेस बनायें (क्योंकि बहुत सारे ब्लोग्स में ओपन यूज़र या गुमनाम द्वारा टिप्पणी देने की अनुमति नहीं होती) और गूगल अकाउंट में रजिस्टर कराएँ। २-इसके उपरांत ब्लॉग एग्रीग्रेटर, जैसे ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत में अपने ब्लॉग (यदि आपने अपना ब्लॉग यहाँ रजिस्टर नहीं करा रखा है तो तुंरत कराएँ) पर जाकर पच्चीस तीस बार क्लिक करें। अब आपका ब्ल...

रात भर

याद तेरी महकाती रही रात भर, लोरियां दे सुलाती रही रात भर, उसको मालूम था मैं बहल जाऊंगा, झूठे सपने दिखाती रही रात भर।

क्या हो गया है इन मीडिया वालों को ?? क्यों पड़ गए हैं सुब्बा जी के पीछे???

हे ईश्वर क्या हो गया है इन मीडिया वालों को? अब बेचारे सुब्बा जी के पीछे पड़ गए कि सुब्बा जी यहाँ पैदा नहीं हुए, ऊपर से सीबीआई ने कोर्ट में कह दिया कि उनके द्वारा लगाये गए तमाम कागजात नकली हैं. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ पैदा हुआ, यहाँ हुआ या नेपाल हुआ, कहीं न कहीं तो पैदा होना ही था. कल को लोग कहने लगेंगे कि भाई तू अस्पताल में पैदा क्यों न हुआ या फिर अस्पताल में हुआ तो फलां अस्पताल में क्यों न हुआ और अगर फलां में हुआ तो फलां टाइम पर क्यों न हुआ. तो बात हो रही थी पैदा होने की, यहाँ के लोगों की फितरत ही कुछ ऐसी है कि पैदा होने को लेकर खाम-खां शोर मचाने लगते हैं, बेचारी सोनिया जी को भी इन्हीं लोगों के कारण त्याग करना पड़ा नहीं तो आज सोनिया जी प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित कर रही होतीं. सुब्बा जी के विरोधियों की यह साजिश है. बेचारे दो बार विधायक और तीन बार ही सांसद बन पाये थे कि यार लोगों ने बवाल मचा दिया. अब मजदूरी करना, लाटरी से पैसा कमाना, ठेकेदारी करना कोई गुनाह है क्या. इतने बांग्लादेशी आ गए, पाकिस्तान से लोग मैच देखने आए, यहीं रह गए, उनके लिए कोई कुछ नहीं कहता, बेचारे सुब्बा...

मोदी सरकार ने यह क्या कर दिया!

बड़ी दिक्कत हो गई धर्म-निरपेक्षी राजनीतिकों, बुद्धिजीवियों और मीडिया वालों को कि आख़िर गुजरात पुलिस ने कैसे अहमदाबाद बम विस्फोट के मास्टर माइंड को गिरफ्तार कर लिया. एक चैनल ने तो इस पर शीर्षक लगा दिया कि क्या आतंकवाद से निपटने के लिए मोदी फार्मूला उपयुक्त है. बात बिल्कुल ठीक है जब बाकी सरकारें आज तक बम विस्फोटों के मास्टर माइंड व्यक्तियों को नहीं पकड़ पायीं तो कैसे हिम्मत हो गई मोदी सरकार और उनके पुलिस अफसरों की कि बम धमाकों के जिम्मेदार आतंकियों को इतनी जल्दी पकड़ लिया.. अरे कोई अमर हुआ है आज तक, मरना हर एक को है ही एक दिन, तो फिर क्या हो गया, अरे बीमारी से मरते तो घर वालों का पैसा ख़राब होता, एक्सीडेंट में मरते तब भी भरती कराना पड़ता. कितनी दिक्कत होती है घरवालों को जब उनके रिश्तेदार बीमार हो जाते हैं. उनकी तीमारदारी, इलाज का खर्च, दवाईओं का खर्च जो एक आम आदमी तो उठा ही नहीं सकता. कम से कम हजार रुपये रोज का खर्च आता है अस्पताल में. बेड चार्जेस, नर्सिंग चार्जेस, विसिट चार्जेस और न जाने क्या क्या. आदमी तो डॉक्टर का बिल देखकर वैसे ही मर जाता है. और लोग कहते भी हैं कि इससे बेहतर होता अगर मर ...

हमें फिर भी शर्म नहीं आती.

एक स्वर्ण, दो कांस्य मिल गए, मीडिया ने ऐसा गुणगान किया कि ऐसा लगने लगा कि जैसे भारत ने पदक तालिका में टॉप किया हो. उन तीनों खिलाड़ियों का गुणगान अवश्य करना चाहिए जिन्होनें अपने बल-बूते पर यह पदक हासिल किए लेकिन यह उनके अपने प्रयास थे, बाकी ५३ खिलाड़ी और ४६ अधिकारियों का बड़ा दल जो बीजिंग गया था, उनके बारे में भी बताया जाना चाहिए, ४६ अधिकारियों के दल का क्या औचित्य था, सानिया मिर्जा की माँ उनके कोच के रूप में कैसे चली गयीं. हमारी महिला खिलाड़ी अपनी पारंपरिक पोशाक तक नहीं पहन सकीं. हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को न्यौता तक नहीं मिला. पिछले ओलम्पिक के, उससे पिछले ओलम्पिक के और इसी प्रकार पिछले कई ओलंपिकों के समय के अखबारों की कतरनें उठाकर देखिये, सब में अधिकारियों के वही बयान छपे होंगे कि अगले ओलम्पिक में अच्छा करेंगे, खिलाड़ियों का वही दुखड़ा और वही बहाने. शर्म यह देखकर आना चाहिए कि जमैका जैसा छोटा देश भी छ; स्वर्ण पदक जीतता है. हमारे देश में सबसे पहले पॉलिटिक्स उसके बाद नौकरशाही फिर भाई-भतीजा वाद और तदुपरांत कैरियर की चिंता, यह सब ऐसे नासूर हैं जो खिलाड़ियों को आगे बढ़ने नहीं ...

"डॉक्टर साहब की व्यावहारिकता(या व्यावसायिकता) की एक सत्य घटना"

मेरे शहर के एक प्रसिद्ध नर्सिंग होम का एक दृश्य - "सुनो भई, वह जो सात नंबर वाला मरीज है, उसका आपरेशन तो कर रहा हूँ तुम्हारे कहने पर, लेकिन वह बचेगा तो है नहीं, इसलिए आपरेशन से पहले उसके घरवालों से दस हजार जमा करा लो, समझ गए." नर्सिंग होम के प्रमुख और सर्जन महोदय ने अपने सामने खड़े एजेंट (जो कि संभवत: कोई छोटा मोटा नीम चिकित्सक था) से कहा. उन महोदय ने सर हिलाया और अन्दर चले गए. क्या कहना चाहेंगे आप इस पर?

आख़िर इसमें मुस्लिमों का क्या दोष है?

भारतीय जनता पार्टी पिछले कई वर्षों से यह आरोप लगाती चली आ रही है कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। उसके अतिरिक्त सभी पार्टियाँ मुसलमानों को खुश करने के लिए तुष्टिकरण का सहारा ले रही हैं। यह सवाल मेरे मन में भी कई बार उठा कि इस आरोप को गहराई में जाकर देखा जाए और इस बात की पुष्टि की जाए कि क्या वास्तव में ही तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं और यदि सभी दल तुष्टिकरण की बात कर रहे हैं तो इसके पीछे क्या कारण हैं? मैंने अभी पिछले दिनों जारी सच्चर आयोग की रिपोर्ट में दिए गए आंकडे देखे, जम्मू कश्मीर पर सभी पार्टियों का रवैया देखा। इसके साथ आन्ध्र प्रदेश में आरक्षण के बारे में भी पढ़ा। पिछले कई निर्णयों जिनमें एक शाहबानो से सम्बंधित फैसला भी था, उसे भी देखा। इस बारे में तो कोई दो-राय हो ही नहीं सकती कि मुस्लिमों के लिए तुष्टिकरण की नीतियाँ लागू की जा रही हैं। इसे बार-बार कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है, यह तो प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन आख़िर क्या कारण है जो सभी पार्टियाँ मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए भाग रही हैं, क्यों उन्हें ही ...